पत्नी पीड़ितों ने भी मनाया अहिंसा दिवस PDF Print E-mail
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Written by संजय स्वदेश   
Friday, 02 October 2009 21:20

नागपुर। इस बार इंटरनैशनल डे ऑफ नॉन वॉयलंस यानी विश्व अहिंसा दिवस संतरानगरी नागपुर के पत्नी पीड़ितों ने अलग ढंग से मनाया है। यह पहला मौका है जब बीवियों के सताए पतियों ने 2 अक्टूबर को घरेलू हिंसा जागरुकता महीना मनाने की शुरुआत किया है। सेव इंडिया फैमिली फाउंडेशन नागपुर के प्रमुख राजेश बखारिया ने बताया कि इसके जरिए वे घरेलू हिंसा कानून के दुरुपयोग के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं।

ज्ञात हो कि 2 अक्टूबर से केंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्रालय महिलाओं के खिलाफ हिंसा के निवारण के लिए नैशनल कैंपेन शुरू किया है। वहीं पुरुषों की शिकायत है कि पत्नियों को घरेलू हिंसा से बचाने के लिए घरेलू हिंसा कानून समेत कुल 1भ् सिविल और क्रिमिनल कानून हैं, लेकिन पतियों, बच्चों और पति के परिवार को बचाने के लिए एक भी कानून नहीं है। पीड़ित पतियों ने अक्टूबर का महीना ही इसलिए चुना, क्योंकि 2006 में अक्टूबर के महीने में ही डोमेस्टिक वॉयलंस ऐक्ट पास हुआ था। श्री बखारिया ने बताया कि उनका संगठन इस अभियान के तहत देश भर में अपना विरोध जताएगा। एक महीने चलने वाले इस शांतिपूर्ण विरोध में नागपुर के अलावा बेंगलुरु, पुणे, हैदराबाद और दिल्ली में कई कार्यक्रम होंगे। उन्होंने बताया कि आम जनता के अलावा उन लोगों को जागरूक किया जाएगा जो शादी कर रहे हैं, लेकिन घरेलू हिंसा कानून के दुष्परिणामों के बारे में जानकारी नहीं है। उन्होंने बताया कि वे विवाह बंधन में बंधने वाले युवाओं को बताएंगे कि वे इस कानून के शिकार न बने सकें।

एसआईएफएफ के फाउंडर सदस्य गुरुदर्शन सिंह ने बताया कि मानवाधिकार के वैश्विक घोषणा के अनुसार कानून की नजर में किसी भी आरोपी को यह अधिकार है कि वह तब तक निर्दोष माना जाए, जब तक दोषी साबित नहीं हो जाता। लेकिन घरेलू हिंसा कानून में हमारा कानून यह मानता है कि जब तक आरोपी निर्दोष साबित नहीं होता, तब तक वह दोषी है। यह निष्पक्ष ट्रायल के यूनिवर्सल सिद्धांत के खिलाफ है। हर साल 4 हजार निर्दोष वरिष्ठ नागरिक और 350 बच्चों समेत करीब एक लाख निर्दोष लोग भारतीय दंड संहिता की धारा 498 ए के तहत बिना सबूत और जांच के गिरफ्तार होते हैं।

मानवाधिकार के वैश्विक घोषणा के मुताबिक कानून की नजर में सब बराबर हैं और बिना किसी भेदभाव के कानून में समान संरक्षण के अधिकारी हैं। साथ ही, संविधान के अनुच्छेद 14 के अनुसार भारत की सीमा के भीतर राष्ट्रय, किसी व्यक्ति को कानून में बराबर के अधिकार और कानून में बराबर संरक्षण के अधिकार से मना नहीं कर सकता। लेकिन घरेलू हिंसा कानून पुरुषों को किसी भी तरह का संरक्षण देने से साफ मना करता है। हर साल 56 हजार से ज्यादा शादीशुदा पुरुष मौखिक, भावनात्मक, आर्थिक और शारीरिक और कानूनी प्रताड़ना के शिकार हो रहे हैं। कानूनी प्रताड़ना के कारण कई लोग आत्महत्या भी करते हैं। पुरुषों के संरक्षण की कोई बात नहीं कर रहा है।

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