अभी तक ज्यादातर महिलाओं पर अत्याचार के मामले सामने आते रहे हैं। इसे रोकने के लिए सशक्त कानून भी बनाए गए हैं। समय बदल रहा है। महिला सशक्तिकरण के जमाने में अब पति पत्नी से पीडि़त हैं। चाहे वे पत्नी के लगाए गए दहेज प्रताडऩा और घरेलू हिंसा के झूठे आरोप हों या फिर घर में आपसी कलह। पत्नी पीिड़ता कहां जाए? न कोई हमदर्दी न कोई सरकारी मदद। नतीजा? पीड़ित पतियों के आत्महत्या का अनुपात पीड़ित पत्नियों से दोगुना है.
इस तथ्य पर बाद में आते हैं लेकिन पहले आपको यह बताते हैं कि 19 नंवबर को तंग पति अंतरराष्ट्रीय पति दिवस के रूप में मनाते हैं। पार्टी करके। बैठक करके। फिल्म देखकर। कुछ पीड़ितों का समूहिक पिकनिक मनाकर एक दिन खुशियों को जी रहे हैं। अपने लिए शायद वैसा दिन पत्नी के साथ फिर कभी नहीं जी पाएंगे। हकीकत बदल रही है। यकीन मानिये जितनी हिंसा महिलाओं के साथ हो रही है, वैसी ही हिंसा पुरुषों के साथ हो रही है। दो वर्ग बन गए हैं। एक ओर जहां पति पत्नी को पीटता है, वहीं दूसरे वर्ग में पत्नी से पति पीडित होकर दिल में टीस लिए जिंदगी से हर आस छोड़ रहा है।
पहली बार त्रिनिदाद और टोबैगो में 1999 में 19 नवंबर को अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस के रूप में मनाया गया। भारत में इसी शुरुआत 2007 से हुई। पत्नी से प्रताडि़त होने के मामले में देश का कोई शहर अछूता नहीं है। बस अंतर इतना है कि महिलाओं से जुड़ी हिंसा को मीडिया ज्यादा कवरेज देता है। पीड़ित पति शर्म संकोच से कहीं नही जाते हैं। करीब डेढ़ दशक पूर्व दिल्ली के विभिन्न इलाकों में कई जगह लिखा हुआ मिलता था - पत्नी सताएं तो हमे बताएं, मिले नहीं लिखें। अब वो तख्ती तो नहीं दिखती है, लेकिन पीड़ित बढ़ गए हैं.