दहेज के कारण पुरुषों का भी उत्पीड़न PDF Print E-mail
Written by सुनीता शानू   
Tuesday, 08 December 2009 12:36

दहेज विरोधी कानून उसके कारण होने वाली मौतों और उत्पीड़न को रोकने के लिये लागू किया गया था न कि मासूम व निर्दोष लोगो को फांसने के लिए। दुर्भाग्य से इसके दुरूपयोग के मामले भी सामने आने लगे है.

देश भर में वर्ष में ७० हजार मामले भारतीय दंड संहिता की धारा "४९८-ए" के अंतर्गत दर्ज किए जाते हैं। प्रतिदिन अनेक निर्दोष आरोपित पुरुष या नाते रिश्तेदारों को सजा हो जाती है, यहां तक की छोटे मासूम बच्चों व घर के बुजुर्गों की जिंदगी भी दांव पर लग जाती है। आंकड़े बताते हैं कि भारत में प्रतिवर्ष ५०,००० स्त्रियां परिवार के सदस्यों द्वारा किसी न किसी रूप में प्रताड़ित होती है। लगभग ६००० पुरुषों पर किए गए सर्वेक्षण से पता चलता है कि अधिकांश पुरुष अपनी पत्नी को किसी न किसी रूप में शारीरिक या मानसिक प्रताड़ना देते हैं अब मुद्दा यही उठता है कि पीड़ित महिला क्या करे, कहां जाए। इससे निपटने के लिए ही भारत सरकार ने सन १९८३ में आइपीसी की धारा ४९८ ए के अंतर्गत "पति या उसके रिश्तेदारों के अत्याचारों" को गैर जमानती अपराध करार दिया था, १९८६ में मुस्लिम महिला के तलाक के खिलाफ अधिकार की सुरक्षा अधिनियम के तहत स्पष्ट किया की तलाक देने वाले पति द्वारा पत्नी को गुजारा भत्ता दिया जाएगा, इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में मशहूर शाहबानो फैसला आया था, १९८७ दिवराल में फिर एक केस हुआ राजस्थान हाईकोर्ट में रूपकवर सती कांड जिसने सबके रौंगटे खड़े कर दिए, हाईकोर्ट ने फिर एक आदेश जारी किया "भारतीय सती रोकथाम अधिनियम १९८७" इसके अंतर्गत सती होना, जबरन सती बनाया जाना, फ़ुसलाना या महिमांडन करना अपराध माना गया। भारतीय दंड संहिता की धारा "४९८-ए" के अनुसार पीड़ित महिला पति या अन्य रिश्तेदारों के खिलाफ याचिका दायर कर न्याय की गुहार कर सकती है। यदि पति या कोई अन्य रिश्तेदार अपराधी घोषित हो जाता है तो उसे कम से कम एक साल से लेकर तीन साल की सजा हो सकती है। इसके आलावा जुर्माना भी हो सकता है।

जेंडर ह्यूमन राइट्स सोसयटी के अध्यक्ष श्री संदीप भाटिया के अनुसार हर साल "४९८-ए" के तहत ५८ हजार मामले दर्ज किए जाते हैं। एक लाख से भी ज्यादा लोग झूठे मामलों में गिरफ्तार होते हैं। हर चार मिनट में एक पुरुष पर दहेज प्रताड़ना का झूठा आरोप लगाया जाता है। हर २.४ घंटे में एक बुजुर्ग नागरिक को दहेज की मांग के झूठे आरोप में फंसा दिया जाता है। हर रोज एक निर्दोष बच्चा इसी धारा में गिरफ्तार होता है, हर २३ मिनट में एक निर्दोष महिला धारा ४९८ए के तहत गिरफ्तार होती है तो हर पांच मिनट में एक निर्दोष सलाखों के पीछे पहुंचता है। अपनी दुश्मनी निकालने के लिए भी कुछ लोग दहेज के गलत आरोप लगा कर निर्दोष लोगों को फंसा देते हैं, जिस पर जस्टिस अशोक भान और जस्टिस डी.के. जैन ने कहा कि सेक्शन "४९८ ए" को दहेज के कारण होने वाली मौतों को रोकने के लिए लागू किया गया था न कि मासूम व निर्दोष लोगों को फांसने के लिए। आईपीसी की धारा "४९८-ए" बनाई तो दहेजलोभियों को सबक सिखाने के लिए ही है लेकिन दुर्भाग्य से इसके दुरुपयोग के मामले भी सामने आने लगे हैं । दहेज निरोधक कानून के तहत दर्ज मामला गैर जमानती और दंडनीय होने के कारण और भी उलझ जाता है। आत्मसम्मान वाले व्यक्ति के लिए यह काफ़ी घातक हो गया है, जब तक अपराध का फ़ैसला होता है जेल में रहते-रहते वह इस तरह खुद को बेइज्जत महसूस करता है कि मर जाना पसंद करता है, जिसके पिछले दिनों में कई किस्से नजर आए थे कि कई पुरुषों ने बदनामी से बचने के लिए आत्महत्या कर ली, आत्मसम्मान वाले आदमी के लिए एक बार गिरफ्तार हो जाना काफी घातक होता है।

कई बार अविवाहित लड़कियों, छोटे बच्चों और बुजुर्गों को आरोपी बना दिया जाता है। अग्रिम जमानत का प्रावधान न होने से उन्हें जेल जाना पड़ता है। इससे लड़कियों के विवाह के अवसर समाप्त हो जाते हैं और बुजुर्गों को जिल्लत झेलनी पड़ती है। एक और सबसे बड़ी समस्या है बेकसूर बच्चे जिन्हें नाहक ही सजा भुगतनी पड़ती है, जो अपने माता-पिता, घर- परिवार से दूर होते जाते हैं व कई बार अपराधी भी बन जाते हैं । इन तमाम बातों को देखते हुए जनता की अपील पर केंद्र सरकार ने निर्देश जारी किए हैं कि दोनों तरफ न्याय बराबर हो, सजा दोषी को ही मिले निर्दोष को नहीं। एवं धारा ४९८-ए के लिए पर्याप्त सबूत मिल जाने पर अन्वेषण के बाद ही दहेज विरोधी मामले दर्ज किए जाएंगे। हो सकता है कानून के इस बदलाव से कानून की बदनामी होने के आसार भी कम हो पाएं किंतु इसके लिए समाज और प्रशासन में भी जरूरी फेरबदल किए जाने चाहिएं । इसी से परिवार का विघटन रुकेगा ।

 

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